अक्सर आप ने बहुतों को कहते सुना होगा कि मुझे बात बात पर क्रोध आता है। शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता हो जब मुझे गुस्सा न आता हो। जब काम पर होता हूँ तो अपने बॉस पर या अपने सहकर्मियों पर गुस्सा आता है ,और मन ही मन उन्हें बद्दुआएं देने लगता हूँ। कभी कभी तो अपने पड़ोसियों या सहकर्मियों को शारीरिक कष्ट भी पहुँचाने का मन करने लगता है। आखिर ऐसा क्यों होता है।
दरअसल रोजमर्रा की भागमभाग भरी जिंदगी में प्रायः हर आदमी किसी न किसी तनाव में जी रहा होता है। ऐसे में तनाव के बीच क्रोध या चिड़चिड़ापन का होना स्वाभाविक है। पर यदि हम चाहें तो थोड़े अभ्यास से क्रोध की नकारात्मक ऊर्जा को एक सकारात्मक ऊर्जा की ओर मोड़ सकते हैं ,और अपने अंतरात्मा को शुद्ध कर सकते हैं। बहुत से लोग क्रोध शांत हो जाने के बाद अफ़सोस और आत्मग्लानि का अनुभव करते हैं। लोगों को यह समझ में नहीं आता की आखिर इस नियंत्रण कैसे किया जाय। यह कोई जरुरी नहीं कि क्रोध किसी व्यक्ति पर ही आता है ,कभी कभी देश और समाज के हालात पर भी मन अधीर होकर उद्ग्विन हो जाता है , उस समय मन नकारात्मक प्रतिक्रिया करने केलिए तैयार हो जाता है।
ऐसी स्तिथि में ज्यादातर लोग सिर्फ दो काम ही करते हैं। या तो व्यक्ति अपने से कमजोर व्यक्ति पर अपना गुस्सा तेज आवाज में बोलकर या फिर हिंसा करके उतारते हैं या फिर गुस्से की अधिकता की वजह से पास पड़े सामान को उठाकर इधर उधर फेंक करके अपने गुस्से का गुबार निकालते हैं। दूसरी क्रिया में व्यक्ति अपने क्रोध को दबा देता है। व्यक्ति अपनी हताशा और बेचैनी को मन और मष्तिष्क की अनेक परतों में बैठा लेता है और इसी को मौन सर्वार्थ साधनं का नाम दे देता है। मगर यह मौन नहीं है ,इसे ही कुंठा कहा जाता है। व्यक्ति जबरन गंभीरता और तटस्था का आवरण ओढ़ लेता है।,पर वक्त बेवक्त दबा हुआ हमारा यही क्रोध मन में एक घाव की तरह रिसता रहता है। ऐसे में कुंठित मन दिशाहीन हो जाता है ,और आदमी अपने लक्ष्य से भटककर बिपरीत दिशा की ओर उन्मुख हो जाता है।
हमें प्रकृति सीख लेना चाहिये जैसे वातावरण में जब बहुत शांति दिखती है ,तो प्रायः सब लोग आने वाले तूफान की आशंका जताना शुरू कर देते हैं। आप सब जानते हैं कि पृथ्वी के निचे के टेक्नीकल प्लेटों पर जब दबाव बढ़ता है ,तो भूकंप आने का कारण बनता है। पृथ्वी की कमजोर सतह पाकर ज्वालामुखी फूट पड़ता है।तूफान या भूकंप का साम्य हमारे मन से है। व्यक्ति क्रोध को दबाने में अस्थायी तौर भले ही सफल हो जाय ,लेकिन मन के ज्वालामुखी रूपी गुबार फूटने की संभावना तो बनी ही रहती है।
अक्सर हम जिसे बुरा मानते हैं ,उसे मन के अंदर दबा लेते हैं (जिसका किसी कारणवश विरोध ना कर पाये हों ). यही दबा हुआ हिस्सा भीतर ही भीतर घुमडता रहता है। अब यदि उसे निकलने का मार्ग जब नहीं मिलता तो वही एक दिन विस्फोट की तरह फट पड़ता है। कभी कभी यही हिंसा का रूप ले लेता है। यदि समाज से हिंसा कम करना है ,तो दबे हुये क्रोध को सकारात्मक तरीके से बाहर निकलना बेहद जरुरी है। अन्याय सहन करना अन्याय करने से कहीं गलत है। मगर हर छोटी छोटी बातों पर क्रोध से परिपूर्ण प्रतिक्रिया देना भी उचित नहीं है। हाँ ,यदि किसी अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने या विरोध करने से किसी का भला हो रहा हो या किसी समूह का ही फायदा हो तो कभी भी हमें ऐसा करने से हिचकिचाना नहीं चाहिए। अंदर का दबा हुआ क्रोध बाहर निकल जाने के बाद ही चित्त शांत हो सकता है ,बशर्ते यही ऊर्जा सकारात्मक तरीके से सामने आये। गुस्से की सही अभिव्यक्ति सुरक्षा भी देती है और अनावश्यक भावों से मुक्ति भी।
गुस्से के क्षणों में हर व्यक्ति को लक्ष्य की प्राप्ति की प्रबल इच्छा भी होती है। किसी समाधान के लिए किया गया गुस्सा अंततः लक्ष्य की ओर ही ले जाता है। लक्ष्य पाने के लिए क्रोध की ऊर्जा को ध्यान और समाधि की ओर मोड़ना पड़ेगा। ध्यान के अभ्यास से चेतन मन के अलावा अवचेतन मन में छिपे तनाव को भी सतह पर लाकर दूर किया जा सकता है। इसलिये हमें रोज पंद्रह से बीस मिनट किसी एक विषय पर आंख बंद करके मन को एकाग्र करने का अभ्यास करना चाहिए। या फिर कमरा बंद करके अकेले बैठ जाँय। जितना भी क्रोध मन में आये , आने दें, यदि किसी को मारने पीटने का मन कर रहा हो तो किसी तकिये मारे पिटे। वह तो कभी मना नहीं करेगा। यह एक हंसने वाली और बेतुकी बात लग सकती है ,पर यह बहुत ही कारगर है। क्रोध को होने दें और ऊर्जा की एक घटना के रूप में आंनद लें। हकीकत में क्रोध ऊर्जा का एक नकारात्मक रूप है। प्रतिदिन सुबह केवल पन्द्रह से बीस मिनट का समय इस पर दें। इसे रोज का ध्यान बना लें। यकीन मानिये धीरे धीरे कुछ दिनों बाद आप शांत होने लगेंगे ,क्योंकि जो ऊर्जा क्रोध बन रही थी ,वह बाहर कर दी गयी। फिर किसी को पीड़ा देने की भावना धीरे धीरे ख़त्म हो जायेगा और फिर किन्हीं परिस्थितियों में आप को क्रोध नहीं आएगा।
दरअसल रोजमर्रा की भागमभाग भरी जिंदगी में प्रायः हर आदमी किसी न किसी तनाव में जी रहा होता है। ऐसे में तनाव के बीच क्रोध या चिड़चिड़ापन का होना स्वाभाविक है। पर यदि हम चाहें तो थोड़े अभ्यास से क्रोध की नकारात्मक ऊर्जा को एक सकारात्मक ऊर्जा की ओर मोड़ सकते हैं ,और अपने अंतरात्मा को शुद्ध कर सकते हैं। बहुत से लोग क्रोध शांत हो जाने के बाद अफ़सोस और आत्मग्लानि का अनुभव करते हैं। लोगों को यह समझ में नहीं आता की आखिर इस नियंत्रण कैसे किया जाय। यह कोई जरुरी नहीं कि क्रोध किसी व्यक्ति पर ही आता है ,कभी कभी देश और समाज के हालात पर भी मन अधीर होकर उद्ग्विन हो जाता है , उस समय मन नकारात्मक प्रतिक्रिया करने केलिए तैयार हो जाता है।
ऐसी स्तिथि में ज्यादातर लोग सिर्फ दो काम ही करते हैं। या तो व्यक्ति अपने से कमजोर व्यक्ति पर अपना गुस्सा तेज आवाज में बोलकर या फिर हिंसा करके उतारते हैं या फिर गुस्से की अधिकता की वजह से पास पड़े सामान को उठाकर इधर उधर फेंक करके अपने गुस्से का गुबार निकालते हैं। दूसरी क्रिया में व्यक्ति अपने क्रोध को दबा देता है। व्यक्ति अपनी हताशा और बेचैनी को मन और मष्तिष्क की अनेक परतों में बैठा लेता है और इसी को मौन सर्वार्थ साधनं का नाम दे देता है। मगर यह मौन नहीं है ,इसे ही कुंठा कहा जाता है। व्यक्ति जबरन गंभीरता और तटस्था का आवरण ओढ़ लेता है।,पर वक्त बेवक्त दबा हुआ हमारा यही क्रोध मन में एक घाव की तरह रिसता रहता है। ऐसे में कुंठित मन दिशाहीन हो जाता है ,और आदमी अपने लक्ष्य से भटककर बिपरीत दिशा की ओर उन्मुख हो जाता है।
हमें प्रकृति सीख लेना चाहिये जैसे वातावरण में जब बहुत शांति दिखती है ,तो प्रायः सब लोग आने वाले तूफान की आशंका जताना शुरू कर देते हैं। आप सब जानते हैं कि पृथ्वी के निचे के टेक्नीकल प्लेटों पर जब दबाव बढ़ता है ,तो भूकंप आने का कारण बनता है। पृथ्वी की कमजोर सतह पाकर ज्वालामुखी फूट पड़ता है।तूफान या भूकंप का साम्य हमारे मन से है। व्यक्ति क्रोध को दबाने में अस्थायी तौर भले ही सफल हो जाय ,लेकिन मन के ज्वालामुखी रूपी गुबार फूटने की संभावना तो बनी ही रहती है।
अक्सर हम जिसे बुरा मानते हैं ,उसे मन के अंदर दबा लेते हैं (जिसका किसी कारणवश विरोध ना कर पाये हों ). यही दबा हुआ हिस्सा भीतर ही भीतर घुमडता रहता है। अब यदि उसे निकलने का मार्ग जब नहीं मिलता तो वही एक दिन विस्फोट की तरह फट पड़ता है। कभी कभी यही हिंसा का रूप ले लेता है। यदि समाज से हिंसा कम करना है ,तो दबे हुये क्रोध को सकारात्मक तरीके से बाहर निकलना बेहद जरुरी है। अन्याय सहन करना अन्याय करने से कहीं गलत है। मगर हर छोटी छोटी बातों पर क्रोध से परिपूर्ण प्रतिक्रिया देना भी उचित नहीं है। हाँ ,यदि किसी अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने या विरोध करने से किसी का भला हो रहा हो या किसी समूह का ही फायदा हो तो कभी भी हमें ऐसा करने से हिचकिचाना नहीं चाहिए। अंदर का दबा हुआ क्रोध बाहर निकल जाने के बाद ही चित्त शांत हो सकता है ,बशर्ते यही ऊर्जा सकारात्मक तरीके से सामने आये। गुस्से की सही अभिव्यक्ति सुरक्षा भी देती है और अनावश्यक भावों से मुक्ति भी।
गुस्से के क्षणों में हर व्यक्ति को लक्ष्य की प्राप्ति की प्रबल इच्छा भी होती है। किसी समाधान के लिए किया गया गुस्सा अंततः लक्ष्य की ओर ही ले जाता है। लक्ष्य पाने के लिए क्रोध की ऊर्जा को ध्यान और समाधि की ओर मोड़ना पड़ेगा। ध्यान के अभ्यास से चेतन मन के अलावा अवचेतन मन में छिपे तनाव को भी सतह पर लाकर दूर किया जा सकता है। इसलिये हमें रोज पंद्रह से बीस मिनट किसी एक विषय पर आंख बंद करके मन को एकाग्र करने का अभ्यास करना चाहिए। या फिर कमरा बंद करके अकेले बैठ जाँय। जितना भी क्रोध मन में आये , आने दें, यदि किसी को मारने पीटने का मन कर रहा हो तो किसी तकिये मारे पिटे। वह तो कभी मना नहीं करेगा। यह एक हंसने वाली और बेतुकी बात लग सकती है ,पर यह बहुत ही कारगर है। क्रोध को होने दें और ऊर्जा की एक घटना के रूप में आंनद लें। हकीकत में क्रोध ऊर्जा का एक नकारात्मक रूप है। प्रतिदिन सुबह केवल पन्द्रह से बीस मिनट का समय इस पर दें। इसे रोज का ध्यान बना लें। यकीन मानिये धीरे धीरे कुछ दिनों बाद आप शांत होने लगेंगे ,क्योंकि जो ऊर्जा क्रोध बन रही थी ,वह बाहर कर दी गयी। फिर किसी को पीड़ा देने की भावना धीरे धीरे ख़त्म हो जायेगा और फिर किन्हीं परिस्थितियों में आप को क्रोध नहीं आएगा।
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