World After Life: Death is a name of life

Wednesday, May 17, 2017

Death is a name of life

हमारा समस्त ज्ञान अनुभव से ही पैदा होता है। इसके अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार से  हम कुछ जान नहीं सकते। शायद यही कारण है की आम जीवन में भी आदमी के अनुभव को वरीयता  दी जाती है। विज्ञान  भी स्वीकार करता है की संसार में कोई पदार्थ नष्ट नहीं होता। यदि ऐसा है तो संसार में नया कुछ भी नहीं और न ही होगा।
  दरअसल मन और मष्तिष्क का  आपस में गहरा सम्बन्ध है और शरीर का नाश होने के साथ ही वह भी नष्ट हो जाता है। आत्मा ही एक मात्र प्रकाशक है। इसलिए उसके हाथ यंत्र के समान हैं और इस के माध्यम से आत्मा बाह्य साधन पर अधिकार जमा लेती है। इस तरह से हमें प्रत्यक्ष का बोध होता है। मष्तिष्क के इन्हीं सब केन्द्रों को हम इन्द्रियाँ कहते हैं। ये इन्द्रियां इन यंत्रों को लेकर मन को दे देती हैं। इसके बाद  मन इन सभी को बुद्धि के नजदीक लाता है। फिर बुद्धि इन्हें अपने सिंहासन पर विराजमान महा शक्तिशाली आत्मा को सौंप देती है। आखिर में आत्मा इन सबको कंट्रोल करते हुये आवश्यकतानुसार निर्देश देती रहती है। तत्पश्चात मन इन मष्तिष्क केंद्रों या इन इन्द्रियों पर कार्य करता है , और फिर इन्द्रियां हमारे स्थूल शरीर पर कार्य करना शुरू कर देती हैं। मानव  की आत्मा ही इन सबकी वास्तविक अनुभवकर्ता ,सृष्टा और सब कुछ है। अब सवाल यह है की मृत्यु क्या है ? दरअसल मृत्यु एक पहलू है और जीवन इसी का दूसरा पहलू है।
     मृत्यु का ही एक और नाम है -जीवन और जीवन का एक और नाम है -मृत्यु। अभिव्यक्ति के एक रूप विशेष को हम जीवन कहते हैं और उसी के दूसरे रूप विशेष को मृत्यु। तरंग जब ऊपर की ओर उठती है तो मानो जीवन है और फिर जब वह गिर जाती है तो मृत्यु। सृष्टि के सभी यौगिक पदार्थ नियमों से संचालित होते हैं। नियम के परे यदि कोई वस्तु हो तो वह कतई यौगिक नहीं हो सकता।
  चूँकि मानव की आत्मा कार्य ,कारण और वाद से अलग है इसलिए वह यौगिक नहीं है। यह हमेशा से मुक्त है और नियमानुसार सभी वस्तुओं का नियमन करती है। उसका कभी नाश नहीं हो सकता। ऐसा इसलिए है ,क्योंकि विनाश का अर्थ है किसी यौगिक पदार्थ का अपने उपादानों में परिणित हो जाना। हमारे जीवन की समस्याओं का वास्तविक व्याख्या यही है। इसी से वस्तु के स्वरुप की भी व्याख्या होती है। 

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